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जमेगी कैसे बिसात-ए-यारां कि शीशा-ओ-जाम बुझ गए हैं
جمے گی کیسے بساط یاراں کہ شیشہ و جام بجھ گئے ہیں
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कुछ तो कह वस्ल की फिर रात चली जाती है
کچھ تو کہہ وصل کی پھر رات چلی جاتی ہے
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शाख़ पर ख़ून-ए-गुल रवाँ है वही
شاخ پر خون گل رواں ہے وہی
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