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बे-यार शहर-ए-दिल का वीरान हो रहा है
بے یار شہر دل کا ویران ہو رہا ہے
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आवेगी मेरी क़ब्र से आवाज़ मेरे बाद
آوے گی میری قبر سے آواز میرے بعد
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रात गुज़रे है मुझे नज़्अ में रोते रोते
رات گزرے ہے مجھے نزع میں روتے روتے
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मुंद गईं खोलते ही खोलते आँखें 'ग़ालिब'
مند گئیں کھولتے ہی کھولتے آنکھیں غالبؔ
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