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नहीं निगाह में मंज़िल तो जुस्तजू ही सही
نہیں نگاہ میں منزل تو جستجو ہی سہی
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कुछ पहले इन आँखों आगे क्या क्या न नज़ारा गुज़रे था
کچھ پہلے ان آنکھوں آگے کیا کیا نہ نظارا گزرے تھا
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हर सिम्त परेशां तेरी आमद के क़रीने
ہر سمت پریشاں تری آمد کے قرینے
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