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दर-ए-कायनात जो वा करे उसी आगही की तलाश है
در کائنات جو وا کرے اسی آگہی کی تلاش ہے
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क्या ऐसे कम-सुख़न से कोई गुफ़्तगू करे
کیا ایسے کم سخن سے کوئی گفتگو کرے
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मिलाऊँ किस की आँखों से मैं अपनी चश्म-ए-हैरां को
ملاؤں کس کی آنکھوں سے میں اپنی چشم حیراں کو
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न आसमाँ से न दुश्मन के ज़ोर-ओ-ज़र से हुआ
نہ آسماں سے نہ دشمن کے زور و زر سے ہوا
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वह और होंगे जिन को हरम की तलाश है
وہ اور ہوں گے جن کو حرم کی تلاش ہے
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