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क़लंदरी

सभी 4अशआर 0ग़ज़ल 4
ग़ज़ल4
दिल जो ज़ेर-ए-ग़ुबार अक्सर था
دل جو زیر غبار اکثر تھا
इश्क़-ए-सनम नमाज़ है है यही ज़िंदगी मिरी
عشق صنم نماز ہے ہے یہی زندگی مری
अब मीरؔ जी तो अच्छे ज़िंदीक़ ही बन बैठे
اب میرؔ جی تو اچھے زندیق ہی بن بیٹھے
शाम हुई है यार आए हैं यारों के हम-राह चलें
شام ہوئی ہے یار آئے ہیں یاروں کے ہم راہ چلیں
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उर्दू अदब की रूह की हिफ़ाज़त

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