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क़ासिद

सभी 3अशआर 0ग़ज़ल 3
ग़ज़ल3
यूं बहार आई है इस बार कि जैसे क़ासिद
یوں بہار آئی ہے اس بار کہ جیسے قاصد
शायद उस सादा ने रक्खा है ख़त
شاید اس سادہ نے رکھا ہے خط
ख़त लिख के कोई सादा न उस को मलूल हो
خط لکھ کے کوئی سادہ نہ اس کو ملول ہو
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