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यूं बहार आई है इस बार कि जैसे क़ासिद
یوں بہار آئی ہے اس بار کہ جیسے قاصد
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शायद उस सादा ने रक्खा है ख़त
شاید اس سادہ نے رکھا ہے خط
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ख़त लिख के कोई सादा न उस को मलूल हो
خط لکھ کے کوئی سادہ نہ اس کو ملول ہو
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