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सभी 6अशआर 0ग़ज़ल 6
ग़ज़ल6
क़ामत को तेरे सर्व-ए-सनोबर नहीं कहा
قامت کو تیرے سرو صنوبر نہیں کہا
अब कैसे रफ़ू पैराहन हो इस आवारा दीवाने का
اب کیسے رفو پیراہن ہو اس آوارہ دیوانے کا
करते ही नहीं तर्क-ए-बुताँ तौर-ए-जफ़ा का
کرتے ہی نہیں ترک بتاں طور جفا کا
गर कुछ हो दर्द आईना यूं चर्ख़-ए-ज़िश्त में
گر کچھ ہو درد آئینہ یوں چرخ زشت میں
गुल शर्म से बह जाएगा गुलशन में हो कर आब सा
گل شرم سے بہہ جائے گا گلشن میں ہو کر آب سا
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उर्दू अदब की रूह की हिफ़ाज़त

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