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क़ामत को तेरे सर्व-ए-सनोबर नहीं कहा
قامت کو تیرے سرو صنوبر نہیں کہا
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अब कैसे रफ़ू पैराहन हो इस आवारा दीवाने का
اب کیسے رفو پیراہن ہو اس آوارہ دیوانے کا
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करते ही नहीं तर्क-ए-बुताँ तौर-ए-जफ़ा का
کرتے ہی نہیں ترک بتاں طور جفا کا
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गर कुछ हो दर्द आईना यूं चर्ख़-ए-ज़िश्त में
گر کچھ ہو درد آئینہ یوں چرخ زشت میں
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गुल शर्म से बह जाएगा गुलशन में हो कर आब सा
گل شرم سے بہہ جائے گا گلشن میں ہو کر آب سا
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