अमजद इस्लाम अमजद का परिचय
विस्तृत जीवनी:
अमजद इस्लाम अमजद 4 अगस्त 1944 को सियालकोट में पैदा हुए। उनकी परवरिश और तालीम लाहौर में हुई, जहाँ उन्होंने गवर्नमेंट कॉलेज, लाहौर से उर्दू अदब में एम.ए. की डिग्री हासिल की। तालीम मुकम्मल करने के बाद उन्होंने पढ़ाने का पेशा अपनाया और कैडेट कॉलेज हसन अब्दाल और इस्लामिया कॉलेज, लाहौर में बतौर प्रोफ़ेसर खिदमत अंजाम दीं। अदबी और फ़नी सफ़र: अमजद साहब ने ग़ज़ल, नज़्म और ख़ास तौर पर आज़ाद नज़्म में एक अलग पहचान बनाई। उनकी शायरी में इश्क़ की नफ़ासत के साथ-साथ ज़िंदगी की सच्चाई, सामाजिक मुश्किलात और इंसानी जज़्बातों का गहरा असर मिलता है। उनका पहला कविता संग्रह 'फ़िशार' आते ही अदबी दुनिया में छा गया, जिसके बाद 'बरज़ख़', 'तसख़ीर', 'उस पार' और 'शारिक़ा' जैसे मशहूर संग्रह आए। टेलीविज़न नाटक और शाहकार रचनाएँ: शायरी के अलावा अमजद इस्लाम अमजद को पाकिस्तान टेलीविज़न (PTV) के सुनहरे दौर के सबसे बड़े नामों में गिना जाता है। उनके लिखे हुए ड्रामे, ख़ास तौर पर 'वारिस' (1979), ने लोकप्रियता के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए और टीवी की तारीख़ का सबसे बड़ा शाहकार माना गया। इसके अलावा 'फ़िशार', 'दहलीज़', 'समुंदर' और 'आप की तारीफ़' जैसे ड्रामों ने समाज की असली तस्वीर को बेहतरीन अंदाज़ में पेश किया। एज़ाज़ात और वफ़ात: उनकी अदबी और फनी ख़िदमात के लिए हुकूमत-ए-पाकिस्तान ने उन्हें 'प्राइड ऑफ़ परफ़ॉर्मेंस' (तमग़ा-ए-हुस्न-ए-कारکردगी) और 'सितारा-ए-इम्तियाज़' से नवाज़ा। इसके अलावा उन्हें निगार अवार्ड और कई दूसरे बड़े इनामो-इकराम मिले। उर्दू अदब का यह चमकता सितारा 10 फ़रवरी 2023 को लाहौर में इस दुनिया से रुख़सत हो गया, लेकिन उनका कलाम और उनके ड्रामे आज भी लोगों के दिलों में ज़िंदा हैं।



