Faiz Ahmad Faiz — Poet

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

1911 — 1984

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ उर्दू के वो अहद-साज़ शायर हैं जिन्होंने इश्क़ की नफ़ासत को इन्क़िलाबी सोच से जोड़कर दुनिया भर में शौहरत हासिल की और अपने विचारों के लिए जेल भी गए।

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ का परिचय

जन्म: 1911
निधन: 1984
उपनाम: फ़ैज़
असली नाम: फ़ैज़ अहमद
क्षेत्र: लाहौर, पाकिस्तान (पैदाइश: सियालकोट)

विस्तृत जीवनी:

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ 13 फ़रवरी 1911 को सियालकोट में पैदा हुए। चर्च मिशन स्कूल से बुनियादी तालीम के बाद उन्होंने गवर्नमेंट कॉलेज, लाहौर से अंग्रेज़ी और अरबी अदब में एम.ए. किया। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत एम.ए.ओ. कॉलेज, अमृतसर से बतौर प्रोफ़ेसर की। तरक़्क़ी-पसंद तहरीक और सहाफ़त: 1936 में तरक़्क़ी-पसंद तहरीक के आग़ाज़ के साथ फ़ैज़ इसके मुख्य स्तम्भ बने। उन्होंने व्यक्तिगत प्यार के साथ-साथ सामाजिक मुद्दों को अपनी शायरी का विषय बनाया। 1939 में जब उनका पहला मजमुआ 'नक़्श-ए-फ़रियादी' आया, तो पूरे अदबी जगत में उनकी पहचान बन गई। वह 'अदब-ए-लतीफ़', 'द पाकिस्तान टाइम्स' और 'इमरोज़' के सम्पादक भी रहे। सियासी आज़माइश और क़ैद-ओ-बंद: पाकिस्तान बनने के बाद उन्होंने मज़दूरों के हक़ों के लिए काम किया। 9 मार्च 1951 को रावलपिंडी साज़िश केस के तहत उन्हें गिरफ़्तार कर लिया गया। हैदराबाद जेल की तन्हाई में उन्होंने 'दस्त-ए-सबा' और 'ज़िंदाँ नामा' जैसे ऐतिहासिक शाहकार लिखे। आलमगीर मक़बूलियत और अदबी सरमाया: फ़ैज़ ग़ज़ल और नज़्म दोनों रूपों के उस्ताद थे। 1962 में उन्हें 'लेनिन पीस प्राइज़' से नवाज़ा गया। 'दस्त-ए-तह-ए-संग', 'सर-ए-वादी-ए-सीना', 'शाम-ए-शहर-ए-याराँ', और 'मेरे दिल मेरे Musafir' उनके मशहूर मजमुए हैं, जिन्हें 'नुस्ख़ाहा-ए-वफ़ा' नाम से कुल्लियात में छापा गया। 20 नवंबर 1984 को लाहौर में उनका इंतक़ाल हुआ।