Fana Bulandshahri — Poet

फ़ना बुलंदशहरी

1912 — 1986

एक महान सूफ़ी शायर और उस्ताद क़मर जलाली के शागिर्द, जिन्हें उनके विश्वप्रसिद्ध कलाम "मेरे रश्क-ए-क़मर" के लिए जाना जाता है।

फ़ना बुलंदशहरी का परिचय

जन्म: 1912
निधन: 1986
उपनाम: फ़ना
असली नाम: हनीफ़ मोहम्मद
क्षेत्र: गुजरांवाला, पाकिस्तान

विस्तृत जीवनी:

फ़ना बुलंदशहरी (वास्तविक नाम: हनीफ़ मोहम्मद), जिनका जन्म 1912 में हुआ, एक अत्यंत प्रभावशाली सूफ़ी और रूमानी शायर थे। गुजरांवाला, पाकिस्तान से ताल्लुक रखने वाले फ़ना ने उस्ताद क़मर जलाली की शागिर्दी में अपनी शायरी की कला को निखारा। वे आजीवन शोहरत और दिखावे से दूर रहे, लेकिन उनके लिखे कलाम ने विश्वस्तर पर अपार ख्याति प्राप्त की। उस्ताद नुसरत फ़तेह अली ख़ान द्वारा गाई गई अमर क़व्वालियाँ—जैसे "मेरे रश्क-ए-क़मर", "काली काली ज़ुल्फ़ों के फंदे न डालो", और "आँख उठी मोहब्बत ने अंगड़ाई ली"—फ़ना की ही बेहतरीन रचनाएँ हैं। उनकी शायरी में क्लासिकी ग़ज़ल की परंपरा और गहरी आध्यात्मिक तड़प का अद्भुत संतुलन देखने को मिलता है। नवंबर 1986 में उनका निधन हुआ, लेकिन उनका कलाम आज भी ज़िंदा है।