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अक्स

सभी 4अशआर 0ग़ज़ल 4
ग़ज़ल4
तड़प उठूँ भी तो ज़ालिम तेरी दुहाई न दूँ
تڑپ اٹھوں بھی تو ظالم تری دہائی نہ دوں
साये ढलने चराग़ जलने लगे
سائے ڈھلنے چراغ جلنے لگے
अपना ख़ाका लगता हूँ
اپنا خاکہ لگتا ہوں
वो अक्स मौजा-ए-गुल था चमन चमन में रहा
وہ عکس موجۂ گل تھا چمن چمن میں رہا
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उर्दू अदब की रूह की हिफ़ाज़त

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