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बहार

सभी 21अशआर 0ग़ज़ल 21
ग़ज़ल21
चमन में गुल ने जो कल दावा-ए-जमाल किया
چمن میں گل نے جو کل دعوی جمال کیا
फिर लौटा है ख़ुर्शीद-ए-जहाँ-ताब सफ़र से
پھر لوٹا ہے خورشید جہاں تاب سفر سے
चलते हो तो चमन को चलिये कहते हैं कि बहारां है
چلتے ہو تو چمن کو چلئے کہتے ہیں کہ بہاراں ہے
यूं बहार आई है इस बार कि जैसे क़ासिद
یوں بہار آئی ہے اس بار کہ جیسے قاصد
कुछ मौज-ए-हवा-ए-पेचां ऐ मीर नज़र आई
کچھ موج ہوا پیچاں اے میرؔ نظر آئی
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