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वहशत थी हमें भी वही घर बार से अब तक
وحشت تھی ہمیں بھی وہی گھر بار سے اب تک
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ज़िक्र भी उस से क्या भला मेरा
ذکر بھی اس سے کیا بھلا میرا
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वो आग़ाज़-ए-मोहब्बत का ज़माना
وہ آغاز محبت کا زمانہ
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अब ज़ोफ़ से ढहता है बेताबी शिताबि की
اب ضعف سے ڈھہتا ہے بیتابی شتابی کی
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कोफ़्त से जान लब पे आई है
کوفت سے جان لب پہ آئی ہے
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