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गुज़श्ता

सभी 7अशआर 0ग़ज़ल 7
ग़ज़ल7
दिल-ओ-दिमाग़ है अब किस को ज़िंदगानी का
دل و دماغ ہے اب کس کو زندگانی کا
हर जज़्र-ओ-मद से दस्त-ओ-बग़ल उठते हैं ख़रोश
ہر جزر و مد سے دست و بغل اٹھتے ہیں خروش
क़रार दिल का ये काहे को ढंग था आगे
قرار دل کا یہ کاہے کو ڈھنگ تھا آگے
नश्शा-ए-शौक़ रंग में तुझ से जुदाई की गई
نشۂ شوق رنگ میں تجھ سے جدائی کی گئی
ज़ख़्म-ए-उम्मीद भर गया कब का
زخم امید بھر گیا کب کا
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उर्दू अदब की रूह की हिफ़ाज़त

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