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हिज्र की शाम
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चांद निकले किसी जानिब तेरी ज़ेबाई का
چاند نکلے کسی جانب تری زیبائی کا
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जमेगी कैसे बिसात-ए-यारां कि शीशा-ओ-जाम बुझ गए हैं
جمے گی کیسے بساط یاراں کہ شیشہ و جام بجھ گئے ہیں
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सभी कुछ है तेरा दिया हुआ
سبھی کچھ ہے تیرا دیا ہوا
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शाम-ए-फ़िराक़ अब ना पूछ आई और आ के टल गई
شام فراق اب نہ پوچھ آئی اور آ کے ٹل گئی
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यह जफ़ा-ए-ग़म का चारा वो नजात-ए-दिल का आलम
یہ جفائے غم کا چارہ وہ نجات دل کا عالم
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