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हिज्र की शाम
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चांद निकले किसी जानिब तेरी ज़ेबाई का
فیض احمد فیض द्वारा
چاند نکلے کسی جانب تری زیبائی کا
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जमेगी कैसे बिसात-ए-यारां कि शीशा-ओ-जाम बुझ गए हैं
فیض احمد فیض द्वारा
جمے گی کیسے بساط یاراں کہ شیشہ و جام بجھ گئے ہیں
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सभी कुछ है तेरा दिया हुआ
فیض احمد فیض द्वारा
سبھی کچھ ہے تیرا دیا ہوا
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शाम-ए-फ़िराक़ अब ना पूछ आई और आ के टल गई
فیض احمد فیض द्वारा
شام فراق اب نہ پوچھ آئی اور آ کے ٹل گئی
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यह जफ़ा-ए-ग़म का चारा वो नजात-ए-दिल का आलम
فیض احمد فیض द्वारा
یہ جفائے غم کا چارہ وہ نجات دل کا عالم
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शब-ए-दर्द-ओ-ग़म से अर्सा मेरे जी पे तंग था
मीर तक़ी मीर द्वारा
شب درد و غم سے عرصہ مرے جی پہ تنگ تھا
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ग़ालिब कि यह दिल-ए-ख़स्ता शब-ए-हिज्र में मर जाए
मीर तक़ी मीर द्वारा
غالب کہ یہ دل خستہ شب ہجر میں مر جائے
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बाग़-ए-आलम में रहे शादी-ओ-मातम की तरह
قمر جلالوی द्वारा
باغ عالم میں رہے شادی و ماتم کی طرح
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तुझे क्या नासिहा अहबाब खुद समझाए जाते हैं
قمر جلالوی द्वारा
تجھے کیا ناصحا احباب خود سمجھائے جاتے ہیں
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