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जुदाई का लम्हा
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कुछ तो कह वस्ल की फिर रात चली जाती है
کچھ تو کہہ وصل کی پھر رات چلی جاتی ہے
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इस क़दर मुसलसल थीं शिद्दतें जुदाई की
اس قدر مسلسل تھیں شدتیں جدائی کی
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ऐसे चुप हैं कि ये मंज़िल भी कड़ी हो जैसे
ایسے چپ ہیں کہ یہ منزل بھی کڑی ہو جیسے
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जब यार ने रख़्त-ए-सफ़र बाँधा
جب یار نے رخت سفر باندھا
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