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ख़िज़ां

सभी 12अशआर 0ग़ज़ल 12
ग़ज़ल12
आगे हमारे अहद से वहशत को जा न थी
آگے ہمارے عہد سے وحشت کو جا نہ تھی
बे सर ओ सामाँ थे लेकिन इतना अंदाज़ा न था
بے سر و ساماں تھے لیکن اتنا اندازہ نہ تھا
नाज़-ए-चमन वही है बुलबुल से गो ख़िज़ां है
ناز چمن وہی ہے بلبل سے گو خزاں ہے
अब इतनी सादगी लाएँ कहाँ से
اب اتنی سادگی لائیں کہاں سے
तुम्हारा हाथ जब मेरे लरज़ते हाथ से छूटा ख़िज़ाँ के आख़िरी दिन थे
تمہارا ہاتھ جب میرے لرزتے ہاتھ سے چھوٹا خزاں کے آخری دن تھے
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