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कल मीर ने क्या क्या की मय के लिए बेताबी
کل میرؔ نے کیا کیا کی مے کے لیے بیتابی
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ग़ैरों से मिल चले तुम मस्त शराब हो कर
غیروں سے مل چلے تم مست شراب ہو کر
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नई तर्ज़ों से मयख़ाने में रंग-ए-मय झलकता था
نئی طرزوں سے میخانے میں رنگ مے جھلکتا تھا
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क़तरा-ए-मय बस्कि हैरत से नफ़स-परवर हुआ
قطرۂ مے بسکہ حیرت سے نفس پرور ہوا
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