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आए कुछ अब्र कुछ शराब आए
آئے کچھ ابر کچھ شراب آئے
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मक़ाम-ए-होश से गुज़रा मकाँ से ला-मकाँ पहुँचा
مقام ہوش سے گزرا مکاں سے لا مکاں پہنچا
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बला से हो शाम की सियाही कहीं तो मंज़िल मरी मिलेगी
بلا سے ہو شام کی سیاہی کہیں تو منزل مری ملے گی
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अब शौक़ से कि जाँ से गुज़र जाना चाहिए
اب شوق سے کہ جاں سے گزر جانا چاہیئے
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दोनों हैं उन के हिज्र का हासिल लिये हुए
دونوں ہیں ان کے ہجر کا حاصل لئے ہوئے
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