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मंज़िल

सभी 6अशआर 0ग़ज़ल 6
ग़ज़ल6
आए कुछ अब्र कुछ शराब आए
آئے کچھ ابر کچھ شراب آئے
मक़ाम-ए-होश से गुज़रा मकाँ से ला-मकाँ पहुँचा
مقام ہوش سے گزرا مکاں سے لا مکاں پہنچا
बला से हो शाम की सियाही कहीं तो मंज़िल मरी मिलेगी
بلا سے ہو شام کی سیاہی کہیں تو منزل مری ملے گی
अब शौक़ से कि जाँ से गुज़र जाना चाहिए
اب شوق سے کہ جاں سے گزر جانا چاہیئے
दोनों हैं उन के हिज्र का हासिल लिये हुए
دونوں ہیں ان کے ہجر کا حاصل لئے ہوئے
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