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कब तलक जी रुके ख़फ़ा होवे
کب تلک جی رکے خفا ہووے
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समझे थे मीरؔ हम कि यह नासूर कम हुआ
سمجھے تھے میرؔ ہم کہ یہ ناسور کم ہوا
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नई तर्ज़ों से मयख़ाने में रंग-ए-मय झलकता था
نئی طرزوں سے میخانے میں رنگ مے جھلکتا تھا
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ज़िंदगी क्या है इक कहानी है
زندگی کیا ہے اک کہانی ہے
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शौक़ है तो है उस का घर नज़दीक
شوق ہے تو ہے اس کا گھر نزدیک
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