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सभी 103अशआर 0ग़ज़ल 103
ग़ज़ल103
अब किसी से मिरा हिसाब नहीं
اب کسی سے مرا حساب نہیں
अपना ख़ाका लगता हूँ
اپنا خاکہ لگتا ہوں
सर ही अब फोड़िए नदामत में
سر ہی اب پھوڑیے ندامت میں
दिल परेशाँ है क्या किया जाए
دل پریشاں ہے کیا کیا جائے
ईज़ा-दही की दाद जो पाता रहा हूँ मैं
ایذا دہی کی داد جو پاتا رہا ہوں میں
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उर्दू अदब की रूह की हिफ़ाज़त

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