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ये ग़म क्या दिल की आदत है, नहीं तो
یہ غم کیا دل کی عادت ہے نہیں تو
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हर तमाशाई फ़क़त साहिल से मंज़र देखता
ہر تماشائی فقط ساحل سے منظر دیکھتا
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तुझ से बिछड़ के हम भी मुक़द्दर के हो गए
تجھ سے بچھڑ کے ہم بھی مقدر کے ہو گئے
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जैसे मैं देखता हूँ लोग नहीं देखते हैं
جیسے میں دیکھتا ہوں لوگ نہیں دیکھتے ہیں
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ये और बात है तुझ से गिला नहीं करते
یہ اور بات ہے تجھ سے گلا نہیں کرتے
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