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मुक़द्दर

सभी 6अशआर 0ग़ज़ल 6
ग़ज़ल6
ये ग़म क्या दिल की आदत है, नहीं तो
یہ غم کیا دل کی عادت ہے نہیں تو
हर तमाशाई फ़क़त साहिल से मंज़र देखता
ہر تماشائی فقط ساحل سے منظر دیکھتا
तुझ से बिछड़ के हम भी मुक़द्दर के हो गए
تجھ سے بچھڑ کے ہم بھی مقدر کے ہو گئے
जैसे मैं देखता हूँ लोग नहीं देखते हैं
جیسے میں دیکھتا ہوں لوگ نہیں دیکھتے ہیں
ये और बात है तुझ से गिला नहीं करते
یہ اور بات ہے تجھ سے گلا نہیں کرتے
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उर्दू अदब की रूह की हिफ़ाज़त

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