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ऐ दोस्त कोई मुझ सा रुस्वा न हुआ होगा
मीर तक़ी मीर द्वारा
اے دوست کوئی مجھ سا رسوا نہ ہوا ہوگا
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बला से हो शाम की सियाही कहीं तो मंज़िल मरी मिलेगी
قمر جلالوی द्वारा
بلا سے ہو شام کی سیاہی کہیں تو منزل مری ملے گی
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हर कोई तुर्रा-ए-पेचाक पहन कर निकला
अहमद फ़राज़ द्वारा
ہر کوئی طرۂ پیچاک پہن کر نکلا
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