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ख़त्म-ए-शब क़िस्सा-ए-मुख़्तसर न हुई
ختم شب قصۂ مختصر نہ ہوئی
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आह को समझे हो क्या दिल से अगर हो जाएगी
آہ کو سمجھے ہو کیا دل سے اگر ہو جائے گی
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किसी सूरत सहर नहीं होती
کسی صورت سحر نہیں ہوتی
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चमन में सुबह ये कहती थी हो कर चश्म-ए-तर शबनम
چمن میں صبح یہ کہتی تھی ہو کر چشم تر شبنم
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