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सहर

सभी 4अशआर 0ग़ज़ल 4
ग़ज़ल4
ख़त्म-ए-शब क़िस्सा-ए-मुख़्तसर न हुई
ختم شب قصۂ مختصر نہ ہوئی
आह को समझे हो क्या दिल से अगर हो जाएगी
آہ کو سمجھے ہو کیا دل سے اگر ہو جائے گی
किसी सूरत सहर नहीं होती
کسی صورت سحر نہیں ہوتی
चमन में सुबह ये कहती थी हो कर चश्म-ए-तर शबनम
چمن میں صبح یہ کہتی تھی ہو کر چشم تر شبنم
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उर्दू अदब की रूह की हिफ़ाज़त

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