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शम्अ-ओ-परवाना
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कल शब-ए-हिज्राँ थी लब पर नाला-ए-बीमाराना था
کل شب ہجراں تھی لب پر نالہ بیمارانہ تھا
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इस में कोई फ़रेब तो ऐ आसमाँ नहीं
اس میں کوئی فریب تو اے آسماں نہیں
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न किसी से पास मेरे यार का आना गया
نا کسی سے پاس میرے یار کا آنا گیا
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अब मुझे गुलशन से क्या जब ज़ेर-ए-दाम आ ही गया
اب مجھے گلشن سے کیا جب زیر دام آ ہی گیا
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