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था मुस्तआर हुस्न से उस के जो नूर था
मीर तक़ी मीर द्वारा
تھا مستعار حسن سے اس کے جو نور تھا
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गुल को महबूब हम क़यास किया
मीर तक़ी मीर द्वारा
گل کو محبوب ہم قیاس کیا
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ख़त्म-ए-शब क़िस्सा-ए-मुख़्तसर न हुई
قمر جلالوی द्वारा
ختم شب قصۂ مختصر نہ ہوئی
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देखते हैं रक़्स में दिन रात पैमाने को हम
قمر جلالوی द्वारा
دیکھتے ہیں رقص میں دن رات پیمانے کو ہم
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हुस्न कब इश्क़ का मम्नूने-वफ़ा होता है
قمر جلالوی द्वारा
حسن کب عشق کا ممنون وفا ہوتا ہے
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अगर छोटा भी इस से आइना-ख़ाना तो क्या होगा
قمر جلالوی द्वारा
اگر چھوٹا بھی اس سے آئنہ خانہ تو کیا ہوگا
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अब कैसे रफ़ू पैराहन हो इस आवारा दीवाने का
قمر جلالوی द्वारा
اب کیسے رفو پیراہن ہو اس آوارہ دیوانے کا
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नाले का आज दिल से फिर लब तलक गुज़र है
मीर तक़ी मीर द्वारा
نالے کا آج دل سے پھر لب تلک گزر ہے
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तुम को हम ख़ाक नशीनों का ख़याल आने तक
قمر جلالوی द्वारा
تم کو ہم خاک نشینوں کا خیال آنے تک
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कभी कहा न किसी से तेरे फ़साने को
قمر جلالوی द्वारा
کبھی کہا نہ کسی سے ترے فسانے کو
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किसी का नाम लो बे-नाम अफ़साने बहुत से हैं
قمر جلالوی द्वारा
کسی کا نام لو بے نام افسانے بہت سے ہیں
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शब शम्अ पर पतंग के आने को इश्क़ है
मीर तक़ी मीर द्वारा
شب شمع پر پتنگ کے آنے کو عشق ہے
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मरीज़-ए-मोहब्बत उन्हीं का फ़साना सुनाता रहा दम निकलते निकलते
قمر جلالوی द्वारा
مریض محبت انہیں کا فسانہ سناتا رہا دم نکلتے نکلتے
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रुख़-ए-निगार से है सोज़-ए-जावेदानी शम्अ
मिर्ज़ा ग़ालिब द्वारा
رخ نگار سے ہے سوز جاودانی شمع
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फ़िक्र है माह के जो शहर बदर करने की
मीर तक़ी मीर द्वारा
فکر ہے ماہ کے جو شہر بدر کرنے کی
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सवाल छोड़ कि हालत ये क्यों बनाई है
قمر جلالوی द्वारा
سوال چھوڑ کہ حالت یہ کیوں بنائی ہے
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सांस इन के मरीज़-ए-हसरत की रुक रुक के चलती जाती है
قمر جلالوی द्वारा
سانس ان کے مریض حسرت کی رک رک کے چلتی جاتی ہے
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करते भी क्या हुज़ूर न जब अपने घर मिले
قمر جلالوی द्वारा
کرتے بھی کیا حضور نہ جب اپنے گھر ملے
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मशहूर चमन में तिरी गुल पैरहनी है
मीर तक़ी मीर द्वारा
مشہور چمن میں تری گل پیرہنی ہے
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हम इस गली का बड़ा एहतराम करते हैं
قمر جلالوی द्वारा
ہم اس گلی کا بڑا احترام کرتے ہیں
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