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सभी 145अशआर 0ग़ज़ल 145
ग़ज़ल145
नया इक रिश्ता पैदा क्यों करें हम
نیا اک رشتہ پیدا کیوں کریں ہم
तेरे क़रीब आ के बड़ी उलझनों में हूँ
تیرے قریب آ کے بڑی الجھنوں میں ہوں
दोस्त बन कर भी नहीं साथ निभाने वाला
دوست بن کر بھی نہیں ساتھ نبھانے والا
शैख़ आख़िर ये सुराही है कोई ख़ुम तो नहीं
شیخ آخر یہ صراحی ہے کوئی خم تو نہیں
ऐ मेरे हम-नशीं चल कहीं और चल इस चमन में अब अपना गुज़ारा नहीं
اے مرے ہم نشیں چل کہیں اور چل اس چمن میں اب اپنا گزارہ نہیں
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उर्दू अदब की रूह की हिफ़ाज़त

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