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नया इक रिश्ता पैदा क्यों करें हम
نیا اک رشتہ پیدا کیوں کریں ہم
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तेरे क़रीब आ के बड़ी उलझनों में हूँ
تیرے قریب آ کے بڑی الجھنوں میں ہوں
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दोस्त बन कर भी नहीं साथ निभाने वाला
دوست بن کر بھی نہیں ساتھ نبھانے والا
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शैख़ आख़िर ये सुराही है कोई ख़ुम तो नहीं
شیخ آخر یہ صراحی ہے کوئی خم تو نہیں
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ऐ मेरे हम-नशीं चल कहीं और चल इस चमन में अब अपना गुज़ारा नहीं
اے مرے ہم نشیں چل کہیں اور چل اس چمن میں اب اپنا گزارہ نہیں
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