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सितम-ए-फ़लक
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कुछ मुहतसिबों की ख़लवत में कुछ वाइज़ के घर जाती है
کچھ محتسبوں کی خلوت میں کچھ واعظ کے گھر جاتی ہے
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अफ़सोस कि दंदाँ का किया रिज़्क़ फ़लक ने
افسوس کہ دنداں کا کیا رزق فلک نے
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मेरा ख़ामोश रह कर भी उन्हें सब कुछ सुना देना
مرا خاموش رہ کر بھی انہیں سب کچھ سنا دینا
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