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अब ज़ोफ़ से ढहता है बेताबी शिताबि की
اب ضعف سے ڈھہتا ہے بیتابی شتابی کی
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रुख़-ए-निगार से है सोज़-ए-जावेदानी शम्अ
رخ نگار سے ہے سوز جاودانی شمع
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निकले है जिंस-ए-हुस्न किसी कारवाँ में
نکلے ہے جنس حسن کسی کاروان میں
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क्या कहें आतिश-ए-हिज्राँ से गले जाते हैं
کیا کہیں آتش ہجراں سے گلے جاتے ہیں
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गर्मी से मैं तो आतिश-ए-ग़म की पिघल गया
گرمی سے میں تو آتش غم کی پگھل گیا
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