मिर्ज़ा ग़ालिब का परिचय
विस्तृत जीवनी:
मिर्ज़ा असदुल्लाह ख़ान, जिन्हें दुनिया ग़ालिब के नाम से जानती है, 1797 में आगरा में पैदा हुए। उनका ताल्लुक़ सेल्जूक़ी तुर्कों के एक इज़्ज़तदार ख़ानदान से था, जो मुग़लों और ईस्ट इंडिया कंपनी की फ़ौज में अहम ओहदों पर रहे। बचपन में ही वालिद और चाचा के इंतक़ाल के बाद उनकी परवरिश ननिहाल के ख़ुशहाल माहौल में हुई। इस लाड़-प्यार ने उनमें शाही और खर्चीली आदतें पैदा कीं। उन्होंने कोई रस्मी (औपचारिक) तालीम हासिल नहीं की, बल्कि अपनी ज़हानत से इल्म हासिल किया। 13 साल की उम्र में शादी के बाद वह 1812 में हमेशा के लिए देहली आ गए। ज़ाती सानहात और माली मुश्किलात: ग़ालिब की ज़िन्दगी शुरुआती कुछ सालों को छोड़कर लगातार दुखों और परेशानियों से भरी रही। उनकी आमदनी का कोई पक्का ज़रिया नहीं था और वह हमेशा कर्ज़ों और सरपरस्तों (पेट्रॉन्स) पर निर्भर रहे। उनकी शादीशुदा ज़िन्दगी भी मिज़ाज के इख़्तिलाफ़ (अंतर) की वजह से मुश्किल रही। उनके सात बच्चे पैदा हुए लेकिन कोई भी ज़िन्दा न बच सका, यहाँ तक कि उनके गोद लिए हुए भानजे 'आरिफ़' का भी जवानी में इंतक़ाल हो गया। दरबारी सरपरस्ती और 1857 का ग़दर: उन्हें लखनऊ और देहली के दरबारों से वह मुक़ाम बहुत देर से मिला जिसके वह हक़दार थे। लखनऊ से मिलने वाला इनाम दरबारियों की साज़िश की भेंट चढ़ गया। देहली दरबार ने उन्हें 1850 में बहादुर शाह ज़फ़र के दौर में शाही इतिहासकार मुक़र्रर किया और ख़िताब अता किए। ज़ौक़ की वफ़ात के बाद 1854 में वह उस्ताद-ए-शाह बने, लेकिन 1857 की बग़ावत ने उनके सारे ख़्वाब तोड़ दिए और उन्होंने देहली की तबाही को अपनी आँखों से देखा। शख़्सियत और फ़िक्री मिज़ाज: ग़ालिब मिज़ाज से एक नवाब थे। उनमें ख़ुद्दारी, प्यार और दरियादिली का एक अनोखा संगम था। वह दोस्तों के लिए मुख़्लिस मगर दुश्मनों के लिए सख़्त थे। वह मज़हबी तंग-नज़री से बिल्कुल आज़ाद थे और ज़िन्दगी की अच्छी चीज़ों—शराब, शतरंज, और आमों—के शौक़ीन थे। मुश्किल तरीन हालात में भी उनकी हाज़िर-जवाबी और हँसी-मज़ाक़ की आदत क़ायम रही; वह अपनी परेशानियों पर भी मुस्कुरा सकते थे। शाइराना सफ़र और फ़लसफ़ा: हालाँकि ग़ालिब अपनी फ़ारसी शायरी को ज़्यादा अहमियत देते थे, लेकिन उनकी शोहरत उनकी उर्दू शायरी की वजह से है। शुरुआत में उन्होंने बेदिल से मुतास्सिर होकर बहुत मुश्किल शायरी की, लेकिन 25 साल की उम्र तक आते-आते उन्होंने एक सादा और गहरा अंदाज़ अपना लिया। उनकी ग़ज़लों में इंसानी जज़्बात, ज़िन्दगी और मौत के फ़लसफ़े और गहरे सवाल मिलते हैं। उन्होंने अंग्रेजी मेटाफिज़िकल शायरों की तरह अलग-अलग ख़यालात को बेहतरीन अंदाज़ में पिरोया और इश्क़ को एक नया हक़ीक़ी रंग दिया। ख़ुतूत-निगारी और जदीद नथ्र: ग़ालिब की पहचान सिर्फ़ उनकी शायरी नहीं बल्कि उनके उर्दू ख़त (पत्र) भी हैं, जिनका आग़ाज़ उन्होंने 1849 के क़रीब किया। उन्होंने पुराने और भारी-भरकम दरबारी अल्फ़ाज़ को छोड़कर ख़तों को एक सादा, दोस्ताना और बातचीत का अंदाज़ दिया। उनके ख़तों की इस बेतकल्लुफ़ी और सादगी ने उर्दू गद्य (नथ्र) को एक नया और हमेशा ज़िन्दा रहने वाला रूप दिया।



