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आफ़ताब

सभी 4अशआर 0ग़ज़ल 4
ग़ज़ल4
आए कुछ अब्र कुछ शराब आए
آئے کچھ ابر کچھ شراب آئے
पीते ही सुर्ख़ आँखें हैं मस्त शराब की
پیتے ہی سرخ آنکھیں ہیں مست شراب کی
हम शक्ल कह दिया था रुख़ ला जवाब का
ہم شکل کہہ دیا تھا رخ لا جواب کا
ऐ तू कि रोज़ ओ शब को मह ओ आफ़ताब दे
اے تو کہ روز و شب کو مہ و آفتاب دے
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उर्दू अदब की रूह की हिफ़ाज़त

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