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हस्ती अपनी हबाब की सी है
ہستی اپنی حباب کی سی ہے
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मुँह तका ही करे है जिस तिस का
منہ تکا ہی کرے ہے جس تس کا
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पयाम आए हैं उस यार-ए-बे-वफ़ा के मुझे
پیام آئے ہیں اس یار بے وفا کے مجھے
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फिर आईना-ए-आलम शायद कि निखर जाए
پھر آئینۂ عالم شاید کہ نکھر جائے
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ख़त्म-ए-शब क़िस्सा-ए-मुख़्तसर न हुई
ختم شب قصۂ مختصر نہ ہوئی
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