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आईना

सभी 14अशआर 0ग़ज़ल 14
ग़ज़ल14
हस्ती अपनी हबाब की सी है
ہستی اپنی حباب کی سی ہے
मुँह तका ही करे है जिस तिस का
منہ تکا ہی کرے ہے جس تس کا
पयाम आए हैं उस यार-ए-बे-वफ़ा के मुझे
پیام آئے ہیں اس یار بے وفا کے مجھے
फिर आईना-ए-आलम शायद कि निखर जाए
پھر آئینۂ عالم شاید کہ نکھر جائے
ख़त्म-ए-शब क़िस्सा-ए-मुख़्तसर न हुई
ختم شب قصۂ مختصر نہ ہوئی
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उर्दू अदब की रूह की हिफ़ाज़त

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