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आरज़ू

सभी 51अशआर 0ग़ज़ल 51
ग़ज़ल51
मेरी लौ लगी है तुझसे ग़म-ए-ज़िंदगी मिटा दे
مری لو لگی ہے تجھ سے غم زندگی مٹا دے
चांद निकले किसी जानिब तेरी ज़ेबाई का
چاند نکلے کسی جانب تری زیبائی کا
किए आरज़ू से पैमां जो मा'ल तक न पहुंचे
کیے آرزو سے پیماں جو مآل تک نہ پہنچے
गरचह कब देखते हो पर देखो
گرچہ کب دیکھتے ہو پر دیکھو
बरंग-ए-बू-ए-गुल इस बाग़ के हम आश्ना होते
برنگ بوئے گل اس باغ کے ہم آشنا ہوتے
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