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हस्ती अपनी हबाब की सी है
मीर तक़ी मीर द्वारा
ہستی اپنی حباب کی سی ہے
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जमेगी कैसे बिसात-ए-यारां कि शीशा-ओ-जाम बुझ गए हैं
فیض احمد فیض द्वारा
جمے گی کیسے بساط یاراں کہ شیشہ و جام بجھ گئے ہیں
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तेरे होते हुए महफ़िल में जलाते हैं चराग़
अहमद फ़राज़ द्वारा
تیرے ہوتے ہوئے محفل میں جلاتے ہیں چراغ
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कितनी सरकश भी हो सरफिरी यह हवा रखना रोशन दिया
Amjad Islam Amjad द्वारा
کتنی سرکش بھی ہو سرپھری یہ ہوا رکھنا روشن دیا
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सोज़-ए-ग़म-ए-फ़िराक़ से दिल को बचाए कौन
قمر جلالوی द्वारा
سوز غم فراق سے دل کو بچائے کون
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वफ़ा के बाब में इल्ज़ाम-ए-आशिक़ी न लिया
अहमद फ़राज़ द्वारा
وفا کے باب میں الزام عاشقی نہ لیا
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रिदा-ए-ज़ख़्म हर गुल-पैरहन पहने हुए है
अहमद फ़राज़ द्वारा
ردائے زخم ہر گل پیرہن پہنے ہوئے ہے
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