Hawa Mehak Uthi Rang-e-Chaman Badalne Laga
ہوا مہک اٹھی رنگ چمن بدلنے لگا
हवा महक उठी रंग-ए-चमन बदलने लगा
ग़ज़ल
१ मिनट पढ़ने मेंہوا مہک اٹھی رنگ چمن بدلنے لگا
وہ میرے سامنے جب پیرہن بدلنے لگا
Hawa mehak uthi rang-e-chaman badalne laga
Woh mere saamne jab pairahan badalne laga
हवा महक उठी रंग-ए-चमन बदलने लगा
वो मेरे सामने जब पैरहन बदलने लगा
بہم ہوئے ہیں تو اب گفتگو نہیں ہوتی
بیان حال میں طرز سخن بدلنے لگا
Baham huye hain toh ab guftugu nahin hoti
Bayaan-e-haal mein tarz-e-sukhan badalne laga
बहम हुए हैं तो अब गुफ़्तुगू नहीं होती
बयान-ए-हाल में तर्ज़-ए-सुख़न बदलने लगा
اندھیرے میں بھی مجھے جگمگا گیا ہے کوئی
بس اک نگاہ سے رنگ بدن بدلنے لگا
Andhere mein bhi mujhe jagmaga gaya hai koi
Bas ik nigaah se rang-e-badan badalne laga
अंधेरे में भी मुझे जगमगा गया है कोई
बस इक निगाह से रंग-ए-बदन बदलने लगा

परवीन शाकिर उर्दू की वो अनूठी और मक़बूल शायरा थीं, जिन्होंने औरतों के जज़्बातों, इश्क़ की गहराई और सामाजिक जुल्म के ख़िलाफ़ बेबाक आवाज़ उठाकर स्त्री शायरी को एक नया आयाम दिया।
पूरी प्रोफ़ाइल देखें →


तब्सिरे
तब्सिरे लोड हो रहे हैं…
अभी कोई तब्सिरा नहीं — सबसे पहले अपनी राय दें।