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बेताबी

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ग़ज़ल7
कल मीर ने क्या क्या की मय के लिए बेताबी
کل میرؔ نے کیا کیا کی مے کے لیے بیتابی
अब ज़ोफ़ से ढहता है बेताबी शिताबि की
اب ضعف سے ڈھہتا ہے بیتابی شتابی کی
जराहत तोहफ़ा, अलमास अरमग़ां, दाग़-ए-जिगर हदिया
جراحت تحفہ الماس ارمغاں داغ جگر ہدیہ
बेताबियों में तंग हम आए हैं जान से
بیتابیوں میں تنگ ہم آئے ہیں جان سے
गुल शर्म से बह जाएगा गुलशन में हो कर आब सा
گل شرم سے بہہ جائے گا گلشن میں ہو کر آب سا
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उर्दू अदब की रूह की हिफ़ाज़त

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