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जान से इश्क़ और जहाँ से गुरेज़
جان سے عشق اور جہاں سے گریز
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ये आलम-ए-शौक़ का देखा न जाए
یہ عالم شوق کا دیکھا نہ جائے
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लख़्त-ए-जिगर तो अपने यक लख़्त रो चुका था
لخت جگر تو اپنے یک لخت رو چکا تھا
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ये ग़नीमत है कि उन आँखों ने पहचाना हमें
یہ غنیمت ہے کہ ان آنکھوں نے پہچانا ہمیں
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वहशत थी हमें भी वही घर बार से अब तक
وحشت تھی ہمیں بھی وہی گھر بار سے اب تک
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