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फिर उसी रहगुज़र पर शायद
پھر اسی رہ گزار پر شاید
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वो दुश्मन-ए-जाँ जाँ से प्यारा भी कभी था
وہ دشمن جاں جان سے پیارا بھی کبھی تھا
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जो भी दरून-ए-दिल है वो बाहर न आएगा
جو بھی درون دل ہے وہ باہر نہ آئے گا
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कशीदा सर से तवक़्क़ो अबस झुकाव की थी
کشیدہ سر سے توقع عبث جھکاؤ کی تھی
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बहुत दिल को कुशादा कर लिया क्या
بہت دل کو کشادہ کر لیا کیا
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