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सभी 34अशआर 0ग़ज़ल 34
ग़ज़ल34
फिर उसी रहगुज़र पर शायद
پھر اسی رہ گزار پر شاید
वो दुश्मन-ए-जाँ जाँ से प्यारा भी कभी था
وہ دشمن جاں جان سے پیارا بھی کبھی تھا
जो भी दरून-ए-दिल है वो बाहर न आएगा
جو بھی درون دل ہے وہ باہر نہ آئے گا
कशीदा सर से तवक़्क़ो अबस झुकाव की थी
کشیدہ سر سے توقع عبث جھکاؤ کی تھی
बहुत दिल को कुशादा कर लिया क्या
بہت دل کو کشادہ کر لیا کیا
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उर्दू अदब की रूह की हिफ़ाज़त

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