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मेरी लौ लगी है तुझसे ग़म-ए-ज़िंदगी मिटा दे
مری لو لگی ہے تجھ سے غم زندگی مٹا دے
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अश्क आँखों में कब नहीं आता
اشک آنکھوں میں کب نہیں آتا
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दिल जो ज़ेर-ए-ग़ुबार अक्सर था
دل جو زیر غبار اکثر تھا
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हसरत-ए-दीद में गुज़रां हैं ज़माने कब से
حسرتِ دید میں گزراں ہیں زمانے کب سے
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देख तो दिल के जाँ से उठता है
دیکھ تو دل کہ جاں سے اٹھتا ہے
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