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हसरत-ए-दीद में गुज़रां हैं ज़माने कब से
حسرتِ دید میں گزراں ہیں زمانے کب سے
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दश्त-ए-दिल में सराब ताज़ा हैं
دشت دل میں سراب تازہ ہیں
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दैर-ओ-हरम से गुज़रे अब दिल है घर हमारा
دیر و حرم سے گزرے اب دل ہے گھر ہمارا
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फिर आईना-ए-आलम शायद कि निखर जाए
پھر آئینۂ عالم شاید کہ نکھر جائے
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दाम-ए-ख़ुश्बू में गिरफ़्तार सबा है कब से
دام خوشبو میں گرفتار صبا ہے کب سے
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