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हसरत-ए-दीद में गुज़रां हैं ज़माने कब से
فیض احمد فیض द्वारा
حسرتِ دید میں گزراں ہیں زمانے کب سے
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दश्त-ए-दिल में सराब ताज़ा हैं
Amjad Islam Amjad द्वारा
دشت دل میں سراب تازہ ہیں
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दैर-ओ-हरम से गुज़रे अब दिल है घर हमारा
मीर तक़ी मीर द्वारा
دیر و حرم سے گزرے اب دل ہے گھر ہمارا
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फिर आईना-ए-आलम शायद कि निखर जाए
فیض احمد فیض द्वारा
پھر آئینۂ عالم شاید کہ نکھر جائے
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दाम-ए-ख़ुश्बू में गिरफ़्तार सबा है कब से
Amjad Islam Amjad द्वारा
دام خوشبو میں گرفتار صبا ہے کب سے
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कहना तिरे मुँह पर तो निपट बे-अदबी है
मीर तक़ी मीर द्वारा
کہنا ترے منہ پر تو نپٹ بے ادبی ہے
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दश्त बे-आब की तरह गुज़री
Amjad Islam Amjad द्वारा
دشت بے آب کی طرح گزری
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ऐ अब्र-ए-तर तू और किसी सिम्त को बरस
मीर तक़ी मीर द्वारा
اے ابر تر تو اور کسی سمت کو برس
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