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दीवाना

सभी 9अशआर 0ग़ज़ल 9
ग़ज़ल9
अजब जुनूं-ए-मुसाफ़त में घर से निकला था
عجب جنون مسافت میں گھر سے نکلا تھا
फिर आईना-ए-आलम शायद कि निखर जाए
پھر آئینۂ عالم شاید کہ نکھر جائے
मुस्तक़िल महरूमियों पर भी तो दिल माना नहीं
مستقل محرومیوں پر بھی تو دل مانا نہیں
अगर छोटा भी इस से आइना-ख़ाना तो क्या होगा
اگر چھوٹا بھی اس سے آئنہ خانہ تو کیا ہوگا
अब कैसे रफ़ू पैराहन हो इस आवारा दीवाने का
اب کیسے رفو پیراہن ہو اس آوارہ دیوانے کا
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