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अजब जुनूं-ए-मुसाफ़त में घर से निकला था
عجب جنون مسافت میں گھر سے نکلا تھا
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फिर आईना-ए-आलम शायद कि निखर जाए
پھر آئینۂ عالم شاید کہ نکھر جائے
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मुस्तक़िल महरूमियों पर भी तो दिल माना नहीं
مستقل محرومیوں پر بھی تو دل مانا نہیں
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अगर छोटा भी इस से आइना-ख़ाना तो क्या होगा
اگر چھوٹا بھی اس سے آئنہ خانہ تو کیا ہوگا
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अब कैसे रफ़ू पैराहन हो इस आवारा दीवाने का
اب کیسے رفو پیراہن ہو اس آوارہ دیوانے کا
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