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अजब जुनूं-ए-मुसाफ़त में घर से निकला था
अहमद फ़राज़ द्वारा
عجب جنون مسافت میں گھر سے نکلا تھا
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फिर आईना-ए-आलम शायद कि निखर जाए
فیض احمد فیض द्वारा
پھر آئینۂ عالم شاید کہ نکھر جائے
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मुस्तक़िल महरूमियों पर भी तो दिल माना नहीं
अहमद फ़राज़ द्वारा
مستقل محرومیوں پر بھی تو دل مانا نہیں
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अगर छोटा भी इस से आइना-ख़ाना तो क्या होगा
قمر جلالوی द्वारा
اگر چھوٹا بھی اس سے آئنہ خانہ تو کیا ہوگا
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अब कैसे रफ़ू पैराहन हो इस आवारा दीवाने का
قمر جلالوی द्वारा
اب کیسے رفو پیراہن ہو اس آوارہ دیوانے کا
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सुरख़ियां क्यों ढूंढ कर लाऊं फ़साने के लिए
قمر جلالوی द्वारा
سرخیاں کیوں ڈھونڈھ کر لاؤں فسانے کے لئے
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गुफ़्तगू अच्छी लगी ज़ौक़-ए-नज़र अच्छा लगा
अहमद फ़राज़ द्वारा
گفتگو اچھی لگی ذوق نظر اچھا لگا
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हवा शब को अबस मय के लिए जाना तो क्या होगा
قمر جلالوی द्वारा
ہوا شب کو عبث مے کے لئے جانا تو کیا ہوگا
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राज़-ए-दिल क्यों न कहूँ सामने दीवानों के
قمر جلالوی द्वारा
راز دل کیوں نہ کہوں سامنے دیوانوں کے
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