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रफ़ाक़तों में पशेमानियाँ तो होती हैं
अहमद फ़राज़ द्वारा
رفاقتوں میں پشیمانیاں تو ہوتی ہیں
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जब तुझे याद करें कार-ए-जहाँ खींचता है
अहमद फ़राज़ द्वारा
جب تجھے یاد کریں کار جہاں کھینچتا ہے
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दोस्त बन कर भी नहीं साथ निभाने वाला
अहमद फ़राज़ द्वारा
دوست بن کر بھی نہیں ساتھ نبھانے والا
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ले उड़ा फिर कोई ख़याल हमें
अहमद फ़राज़ द्वारा
لے اڑا پھر کوئی خیال ہمیں
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दिल बदन का शरीक-ए-हाल कहाँ
अहमद फ़राज़ द्वारा
دل بدن کا شریک حال کہاں
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शाम हुई है यार आए हैं यारों के हम-राह चलें
जौन एलिया द्वारा
شام ہوئی ہے یار آئے ہیں یاروں کے ہم راہ چلیں
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