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ग़ज़ल166
معاف کر مری مستی خدائے عز و جل
معاف کر مری مستی خدائے عز و جل
हवा ही लौ को घटाती वही बढ़ाती है
ہوا ہی لو کو گھٹاتی وہی بڑھاتی ہے
वाँ वो तो घर से अपने पी कर शराब निकला
واں وہ تو گھر سے اپنے پی کر شراب نکلا
जिस जा नसीम शाना-कश-ए-ज़ुल्फ़-ए-यार है
جس جا نسیم شانہ کش زلف یار ہے
ब नाला हासिल-ए-दिल-बस्तगी फ़राहम कर
بہ نالہ حاصل دل بستگی فراہم کر
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