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ग़ज़ल166
परदे में लाख फिर भी नुमूदार कौन है
پردے میں لاکھ پھر بھی نمودار کون ہے
परदे में इस बदन के छुपें राज़ किस तरह
پردے میں اس بدن کے چھپیں راز کس طرح
ज़िंदगानी जावदानी भी नहीं
زندگانی جاودانی بھی نہیں
कब से हम लोग इस भँवर में हैं
کب سے ہم لوگ اس بھنور میں ہیں
मुझे दर से अपने तो टाले है यह बता मुझे तू कहाँ नहीं
مجھے در سے اپنے تو ٹالے ہے یہ بتا مجھے تو کہاں نہیں
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उर्दू अदब की रूह की हिफ़ाज़त

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