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ग़ज़ल166
पलकों की दहलीज़ पे चमका एक सितारा था
پلکوں کی دہلیز پہ چمکا ایک ستارا تھا
उन ने किया था याद मुझे भूल कर कहीं
ان نے کیا تھا یاد مجھے بھول کر کہیں
ग़ाफ़िल ब वहम-ए-नाज़ ख़ुद-आरा है वर्ना याँ
غافل بہ وہم ناز خود آرا ہے ورنہ یاں
है बज़्म-ए-बुताँ में सुख़न आज़ुर्दा लबों से
ہے بزم بتاں میں سخن آزردہ لبوں سے
थक गया है दिल-ए-वहशी मिरा फ़रियाद से भी
تھک گیا ہے دل وحشی مرا فریاد سے بھی
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