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कौन से शौक़ किस हवस का नहीं
کون سے شوق کس ہوس کا نہیں
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शाम तक मेरी बेकली है शराब
شام تک میری بیکلی ہے شراب
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क्या ये आफ़त नहीं अज़ाब नहीं
کیا یہ آفت نہیں عذاب نہیں
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किसी से कोई ख़फ़ा भी नहीं रहा अब तो
کسی سے کوئی خفا بھی نہیں رہا اب تو
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शाम थी और बर्ग-ओ-गुल शल थे मगर सबा भी थी
شام تھی اور برگ و گل شل تھے مگر صبا بھی تھی
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