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सभी 166अशआर 0ग़ज़ल 166
ग़ज़ल166
कौन से शौक़ किस हवस का नहीं
کون سے شوق کس ہوس کا نہیں
शाम तक मेरी बेकली है शराब
شام تک میری بیکلی ہے شراب
क्या ये आफ़त नहीं अज़ाब नहीं
کیا یہ آفت نہیں عذاب نہیں
किसी से कोई ख़फ़ा भी नहीं रहा अब तो
کسی سے کوئی خفا بھی نہیں رہا اب تو
शाम थी और बर्ग-ओ-गुल शल थे मगर सबा भी थी
شام تھی اور برگ و گل شل تھے مگر صبا بھی تھی
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