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फ़िराक़

सभी 154अशआर 0ग़ज़ल 154
ग़ज़ल154
कली कहते हैं उस का सा दहन है
کلی کہتے ہیں اس کا سا دہن ہے
समझ में ज़िंदगी आए कहाँ से
سمجھ میں زندگی آئے کہاں سے
अभी फ़रमान आया है वहाँ से
ابھی فرمان آیا ہے وہاں سے
रंज खींचे थे दाग़ खाए थे
رنج کھینچے تھے داغ کھائے تھے
शाम-ए-फ़िराक़ अब ना पूछ आई और आ के टल गई
شام فراق اب نہ پوچھ آئی اور آ کے ٹل گئی
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